Saturday, 19 September 2026

'मैं हर दम अपनी उम्र से बड़ा था'

काल की चौखट से दो कदम आगे खड़ा था।
मैं हर दम अपनी उम्र से बड़ा था।

मेरे हौसलों का मखौल उड़ाने वाले,
मुझे किताबों ने नहीं, अनुभवों ने गढ़ा था।

लाव-लश्कर से जुलूस निकालने वाला,
चुनाव से पहले तक लोगों के पैरों में पड़ा था।

शिविरों में अध्यात्म का पाठ पढ़ाने वाला,
परदेस में देह के बाज़ार में खड़ा था।

रुकने वालों को वक्त निगल गया।
बचा वही जो अंत तक लड़ा था।

एक जंगल को फिर से जन्म दे गया।
जो पेड़ कटते वक़्त अड़ा था।

जिस बुजुर्ग को तुम मंदा कहते हो,
वो अपनी जवानी में हवा से तेज दौड़ा था।

मैं ख्वाबों-ख्यालों में गुम हो गया।
जब उसने अपनी गर्दन को मेरी तरफ मोड़ा था।

वो पूरी दुनियाँ घूमकर वापस आ गया।
मैं अब भी वहीं खड़ा हूँ जहाँ उसने मुझे छोड़ा था।

वो पुराना जर्जर मकान, घर है मेरा,
जिसकी एक-एक ईंट को दादा ने अपने ईमान से जोड़ा था।

उम्र मायने नहीं रखती पुलकित,
तू उतना चमकेगा जितना तूने खुद को तोड़ा था।

✍️ पुलकित उपाध्याय













Tuesday, 28 July 2026

'मैं सिर्फ़ एक सरफ़िरा शायर हूँ'

ज़िंदगी जब तक रहेगी तन्हा गुज़रेगी।
तू क्यों ख़्वाबों में दिल-ओ-बाज़ार देखता है।

जो रोशनी है वो इस लम्हे में है।
तारीख़ बदलने के बाद कौन अख़बार देखता है।

ये दुनिया ख़ुदगर्ज़ी की हद पर खड़ी है।
तू बेवजह लोगों में हमनशीं देखता है।

मैंने उसको ख़ुदा मानने से इनकार कर दिया।
फिर वो क्यों मुझे अपना भक्त समझता है।

मैं सिर्फ़ एक सरफ़िरा शायर हूँ।
ये निज़ाम मुझे खुलकर बोलने से रोकता है।

बांध टूटने पर बस्तियाँ उजाड़ देते हैं।
तू फ़िज़ूल ही जाते हुए शख़्स को टोकता है।

लोग आएँगे तो आँसुओं का भी सौदा करेंगे।
तू क्यों जज़्बातों को चेहरे पर पटकता है।

मैं उसे एक उम्र से भुलाए बैठा हूँ।
फिर क्यों उसके एक ज़िक्र से मेरा हर मिसरा महकता है।

जवानी बहुत एहतियात से ख़र्च करने की चीज़ है।
फिर क्यों हर आदमी इस मोड़ पर आकर बहकता है।

मैंने कभी उसे कोई इशारा नहीं किया।
फिर वो क्यों मुझे अपना हमसफ़र सोचता है।

'पुलकित', तू सिर्फ़ ख़ुद को मुनासिब कर।
ज़माना तो ख़ुदा को भी ख़ुदा से तौलता है।

✒️पुलकित उपाध्याय

Friday, 8 May 2026

'हम कितने पुराने हैं'

डिस्को की दुनिया में ग़ज़लों के दीवाने हैं, 
हम वाकई कितने पुराने हैं।

वो मुझको खुदा के दर पर ढूँढता फिरता है, 
हमारे तो मंदिर भी मयखाने हैं।

नज़र भर के देखा था उसे कभी, 
उम्र गुज़र गई, हम अब भी उसी के दीवाने हैं।

वो कहते हैं पाँच सालों में सूरत बदल देंगे, 
ये वादे सत्ता में आने के बहाने हैं।

मेरी हार का जश्न मनाने वाले,
तेरा एक दिन है, हमारे सारे ज़माने हैं।

हो सकता है कल हम न रहें, 
हमारे शब्द सदा फिज़ाओं को महकाने हैं।

तुमको सिर्फ़ छत तक जाना है, 
हमें आसमान तक के रास्ते बनाने हैं।

घर बनाने को ज़मीन नहीं है,
मगर, हमको शहर बसाने हैं।

हसरत कुछ कर गुज़रने की है,
फ़िर क्यों इतने पैसे कमाने हैं।

तुम हमको इस तरह न देखो, 
अब हमें और जज़्बात नहीं गँवाने हैं।

यहाँ रिश्ते क्षणभंगुर हैं, 
पर, हमें एक गुज़रे दोस्त से किए वादे निभाने हैं।

जो लोग दिशा दिखाने से भी गुरेज़ करते थे, 
उन्हें हमारी कामयाबी पर हक जताने हैं।

वो मुझको मौत का डर दिखाता है, 
हम सरफिरों से भी बड़े मनमाने हैं।

रेडियो पर ग़ज़ल सुनते ख्याल आया कि ग़ज़ल कही जाए,
ये ग़ज़ल एकदम नई है, बस ख़्याल पुराने हैं।

उसूलों की गठरी से ज़िंदगी नहीं चलती, 
हमको जीना ही कितना है, हम तो परवाने हैं।

✒️ पुलकित उपाध्याय

Friday, 1 May 2026

'एक उम्र लगती है'

उसके चर्चे हैं ज़माने में,
मैं, मैं न रहा जिसे पाने में।

इश्क़ करना बहुत आसान है,
किरदार बदल जाता है निभाने में।

वो मुझको रास्ता दिखाता है,
जिसको उम्र गुज़ारी है सिखाने में।

मैं चुपचाप उस गली से गुज़रता हूँ,
मुझे देखकर शोर मच जाता है मयख़ाने में।

कोई उसे बताए, नशे में भी मेरे पैर लड़खड़ाते नहीं,
वो कब से लगा है मुझे बहकाने में।

ज़िंदगी कोई ख़्वाबों का खेल नहीं,
एक उम्र लगती है खुद को तपाने में।

जिन फूलों को किसी सेहरे में बंधना था,
वो फूल पड़े हैं एक मुर्दे को महकाने में।

जो फल तुम तोहफ़े में लुटा रहे हो,
कई पुश्तें लगी हैं उन्हें पकाने में।

वो आग बस्तियाँ जला गई,
जिसे सिर्फ एक चिंगारी लगी थी सुलगाने में।

एक अख़बार ने थोड़ा सच क्या कह दिया,
पूरी सरकार पड़ी है उसे दबाने में।

लोकतंत्र रोकतंत्र हो चुका है,
अब सरकार तय करेगी मुझे क्या खाना है खाने में।

जब भी उनसे बारह सालों का हिसाब पूछो,
वो कहते हैं तुम्हें पचहत्तर साल लगे हैं हमें लाने में।

मैं हर रोज़ घर से पैसे के लिए निकलता हूँ,
खुशियाँ कहाँ बची हैं अब कमाने में।

जिस बात को तुमने सुनने से पहले नकार दिया,
हमें जवानी लगी है उसे बताने में।

चलो एक और बाज़ी हारी जाए,
अब तकलीफ़ कहाँ है कुछ गँवाने में।

✒️ पुलकित उपाध्याय 

Monday, 23 February 2026

'मैं मुस्कुराता रहूँगा'

खुद के गुम हो जाने पर,
तुम्हारे न मिल पाने पर,
कल के बाद फिर कल के न आने पर,
हालात और भी बिगड़ जाने पर,
कुछ भी समझ न आने पर भी,
मैं मुस्कुराता रहूँगा।


दिल के टूट जाने पर,
साथ छूट जाने पर,
शीशा फूट जाने पर,
दौलत लुट जाने पर,
किस्मत रूठ जाने पर भी,
मैं मुस्कुराता रहूँगा।


आज फिर से नींद न आने पर,
उम्मीद बिखर जाने पर,
अवसर फिसल जाने पर,
समय निकल जाने पर भी,
फिर से दिल के बहल जाने तक,
मैं मुस्कुराता रहूँगा।


सूरज ढ़लने के बाद,
चाँद के निकलने से पहले,
दिन ढ़लने के बाद,
दिन के निकलने से पहले,
हार जाने के बाद,
हार न मानने से पहले, 
पूरी ताकत से संघर्ष करते हुए,
मैं मुस्कुराता रहूँगा।


फिर एक दिन तारीख बदलेगी,
एक नई सुबह, सुबह-सुबह को निकलेगी।
इंद्रधनुष ध्वजा बनेगा,
पसीना सज्जा बनेगा।
हर दिशा सत्कार में दमकेगी,
ज़िंदगी फिर से चमकेगी।
तब से अब के अब से तब के इस दौर में, 
मैं मुस्कुराता रहूँगा।







Saturday, 21 February 2026

विरोधाभास

वो मुझको चाहता तो है, पर छुपाता बहुत है।
वो मेरे किरदार को हर एक पैमाने पर आज़माता बहुत है।

वो किसी संशय में है, किसी उलझन में है या है कोई फ़िक्र उसे,
वो मुझको अपने ख़्वाबों में लाकर सताता बहुत है।

मैं उसकी महक की मृगतृष्णा में एक मृग की भाँति भटकता हूँ,
वो मुझसे इतना दूर होते हुए भी मुझको लुभाता बहुत है।

मैंने एक दिन सोचा कि उससे समझौता किया जाए,
वो सारी यादों को भुलाकर कहता है कि मेरा उससे कोई नाता नहीं है।

मैं चाहूँ तो एक पल में उसकी आँखों से ओझल हो जाऊँ,
कम्बख़्त, ज़माने का ये हुनर मुझको आता नहीं है।

जो प्यादे मेरी चालों को चलकर वज़ीर बन गए,
वो बेगैरत कहते हैं कि मुझको कुछ आता नहीं है।

एक फ़क़ीर सोने का मुकुट चुराते पकड़ा गया,
जो कल मुझसे कह रहा था, साथ कुछ जाता नहीं है।

मैं आँधियों में चरागों को जलाकर बढ़ता चला गया,
मेरा हौसला आँधियों से डगमगाता नहीं है।

उसकी बेदर्दी से आहत होकर भी
मेरा दिल सहमता तो है, पर घबराता नहीं है।

मेरा दिमाग़ चीख-चीख कर कहता है, ख़ुदगर्ज़ बनो,
मेरा दिल मेरी रूह को ये समझाता नहीं है।

मस्जिद की सीढ़ी पर वो मुझे गाता दिखा,
जो रेल में कहकर भीख माँग रहा था कि वो कुछ बोल पाता नहीं है।

चिताओं पर चढ़कर वो कुर्सी पर बैठ गए,
जो कहते थे, हम सेवक हैं, राजनेता नहीं हैं।

मैंने एक अमीर दोस्त से कुछ पैसे उधार माँगे,
वो कहने लगा, मैं खर्च उतना करता हूँ, जितना कमाता नहीं हूँ।

मैं दिन भर शरीर को तोड़ता-फिरता हूँ,
फ़िर भी रात को चैन से सो पाता नहीं हूँ।

लोग मुझसे पूछा करते हैं कि तुम कहाँ तक उड़ान भरोगे,
मैं उनको कैसे कहूँ कि मेरे पंखों के दायरे का आसमान में माप आता नहीं है।

मैंने एक दिन सोचा कि ख़ुदकुशी कर लूँ,
समुंदर मुझे किनारे फेंककर कहने लगा कि तू मुझ में समाता नहीं है।

मैंने कोशिश की कि उसको उसके हाल पर छोड़ दिया जाए,
मेरा मन ख़ुद को उसके पास जाने से रोक पाता नहीं है।

मैंने अगर आँख फेर ली तो वो पछताता फ़िरेगा उम्र भर,
मेरी नज़र वहाँ तक जाती है, जहाँ तक उसका नज़रिया जाता नहीं है।

Thursday, 15 January 2026

फ़ासले

हम दोनों बिल्कुल एक जैसे हैं, लेकिन कुछ फ़ासले हैं हमारे बीच,
जैसे भौर और सांझ के बीच,
आँख और आँख के बीच,
उम्मीद और आस के बीच,
नदी और नांव के बीच,
बस्ती और गाँव के बीच,
जो बहुत नज़दीक दिखते हुए भी एक दूसरे से बहुत दूर हैं,
अपनी रूहानी यात्रा पर, किन्तु व्याकुल हैं,
सही समय की तलाश में,
सही शब्दों के लिबास में,
सही भाव में,
सही राह पर,
सही मोड़ पर,
जो कहीं खो चुके हैं,
जीवन के संघर्षों में,
स्पर्शहीन निष्कर्षों में
समाज की स्वीकृति में,
नैतिकता की संस्कृति में,
अंतःकरण की अवसादित अग्नि में,
सन्नाटों की प्रतिध्वनि में,
मृगतृष्णा के समान क्षणभंगुर लालसा देकर और
पीछे छोड़ गए हैं सिर्फ ये फ़ासले 
और नियति के निष्ठुर काफ़िले।

✒️ पुलकित उपाध्याय 



Wednesday, 31 December 2025

नई भौर

नई भौर
नई ओर
नया छोर
नया मोड
संघर्षों की नई कृपाण
स्वप्नों की नई उड़ान
विचारों कि अभिव्यक्ति नव
निष्कर्षों की स्वीकारोक्ति नव
नई प्रीत, नए मीत 
जीवन के नए गीत
प्राण नवल, स्थान नवल
यौवन कि चाल नवल
नए अवरोध, नया क्रोध
उपचारों का नया शोध
बीते कल को छोड़कर
वर्तमान को मोड़कर
भविष्य कि हम काटें कोर
नई भौर 
नई ओर
नया छोर 
नया मोड




Monday, 20 October 2025

एक दीया...

एक दीया उस राम के नाम जो व्याप्त है कण-कण में,

जो विद्यमान है हर क्षण में, 

जो बैठा है हर रण में,  

जो बसता है हमारे अंतःकरण में

एक दीया उस राम के नाम।



एक दीया उस लक्ष्मण के लिए जिसने त्याग दिया राजभवन को,

आनंद विलास और राज धन को,

जो भ्राता संग भटकता रहा सघन वन को,

जिसने मजबूत किया राम के मन को,

एक दीया उस लक्ष्मण के लिए।



एक दीया उस सीता को अर्पित जो आदर्श और समर्पण की मूरत है,

जो हर संघर्ष में सहजता की सूरत है,

जो मर्यादा पुरूषोत्तम के जीवन की जरूरत है,

जो मां है, जननी है, कुदरत है,

एक दीया उस सीता को अर्पित।



एक दीया उस हनुमान की स्तुति में 

जो चंचल है, स्वामिभक्त है,

जो पुष्प सा कोमल है, पर्वत सा सख्त है,

जो सर्वशक्तिशाली है, परंतु शंकाग्रस्त है

जो ठान ले यदि लक्ष्य को, तो सूर्य भी नतमस्तक है।

एक दीया उस हनुमान की स्तुति में।





एक दीया उस लंकेश की स्मृति में भी

जो वेदों का ज्ञाता था, प्रकांड पंडित था,

जो ब्रह्मा, विष्णु, महेश के वरदानों से मंडित था,

जो प्रतापी था, तपस्वी था, पर

नियति पटल पर खंडित था।

जो सर्वनाशी था, प्रकोपी था, जो प्रभु राम के बाण से रूंडित था,

एक दीया उस लंकेश की स्मृति में।



अंततोगत्वा,

एक दीया मानवता के उद्धार के लिए,

एक दीया प्रकृति के पुनः विस्तार के लिए,

एक दीया आत्म-साक्षात्कार के लिए,

एक दिया रामायण व वाल्मीकि द्वारा प्रदत्त संस्कार के लिए, 

एवं एक दीया आप सभी के द्वार के लिए।



दीपोत्सव की आपको व आपके स्वजनों को हार्दिक शुभकामनाएं।



जय श्री राम!

                    🪔 पुलकित उपाध्याय 🪔

Thursday, 10 July 2025

गुरु

गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर समस्त गुरुजनों को नमन। मैंने अपने हृदय के उद्गारों को अपनी एक कविता के माध्यम से व्यक्त किया है।


                             शीर्षक: गुरु


गर्भ से रुद्र की रूक्ष यात्रा का रम्य तत्व होता है गुरु।
गृह से संन्यास के दुर्गम मार्गों में एकमात्र सत्व होता है गुरु।

गुरु जीवन है, ज्ञान है, प्रकाश है। 
गुरु आस्था है, समर्पण है, विश्वास है।

गुरु मित्र है, मंत्र है, जीवन को जागृत रखने वाला तंत्र है।
गुरु विचार है, व्यवस्था है, अंतःकरण में निहित गणतंत्र है। 

गुरु प्रेम है, सद्भाव है, मां की कोमल गोद है।
गुरु प्रशासन है, अनुशासन है, पिता का प्रज्वलित क्रोध है।

गुरु प्रारब्ध है, समय है, सहचर है।
गुरु शून्य है, तन्य है, अगोचर है। 

गुरु प्रकृति है, श्वास है, सृष्टि है।
गुरु अद्वैत है, आध्यात्म है, अलौकिक दृष्टि है।

गुरु वायु है, अग्नि है, नभ है।
गुरु पृथ्वी है, जल है, सबब है। 

गुरु बुद्धि है, मन है, आत्मचिंतन है।
गुरु शोध है, शुद्धि है, शमन है।

जीवन में जीवन से परे जी का द्रव्य होता है।
गर्भ से रुद्र की रूक्ष यात्रा का रम्य तत्व होता है गुरु।

Monday, 3 February 2025

शीर्षक: निद्रा की खोज

जीवन के संघर्षों में,
अवसादित सिंचित वर्षों में,
क्षणभंगुर उन्मादित हर्षों में,
निष्कर्ष खोजते निष्कर्षों में, 
खो गई है निद्रा।

सामाजिक–पारिवारिक बवालों में,
स्वयं के स्वयं से सवालों में,
प्रेयसी के मूर्छित ख्यालों में,
नियति के निष्ठुर निवालों में,
कहीं खो गई है निद्रा।

राजनैतिक–वैज्ञानिक चिंतन में,
आत्मिक–आध्यात्मिक मंथन में,
वैयक्तिक–चारित्रिक स्कंदन में,
नैतिक–भौतिक क्रंदन में,
गुम हो गई है निद्रा।

स्वप्नों की अखंड अग्नि में,
एकांत की शांत ध्वनि में,
यौवन की प्रस्फुटित रवानी में,
शून्य से शून्य तक की कहानी में,
शायद, स्वयं ही सो गई है निद्रा।

       पुलकित उपाध्याय



Monday, 20 July 2020

उदासी

जीवन से परे, प्रकृति के नज़दीक, रहस्यमयी एकांत में, भावनाओं के बवंडर पर सवार, वक्त को खुद की तहों में समेटे, कभी क्षितिज पर, कभी बगीचे में, कभी खुले आसमान में पंछियों के बीच, कभी मीचि आँखों में कपाल के करीब, शांत, सहज, कुँए के जल के समान स्थिर और समुद्र की लहरों के समान गतिमान, हवा के झोंकों के हर एक कतरे में, हर सूर्यास्त और सूर्योदय के मध्य, हर सूर्योदय और सूर्यास्त के मध्य, मजदूर के चेहरे पर रोटी के रूप में, सेठ के चेहरे पर बोटी के रूप में, शिक्षा के चेहरे पर धन के रूप में, धन के चेहरे पर मन के रूप में, युवाओं के चेहरे पर वासना के रूप में, बुजुर्गों के चेहरे पर प्रेम के रूप में, आकाश की सतह पर बादलों के आकार में, जंगलों की नति पर अग्नि के प्रकार में, हर क्षण में, हर कण में, हर जीवन में, हर नयन में बचपन से दूर, साँसों की आवाजाही में हर तरफ, हर दिशा, हर क्षेत्र, हर अवस्था, हर व्यवस्था, हर कथा में जो मिथ्या है, जो संख्या है वह सब फंतासी है, जो सत्य है, चिरस्थायी है, जो बिना किसी आवेश के पसरी है, वही उदासी है।

Wednesday, 24 June 2020

'A Confession'

People often hamper me with such questions.
Who is she?
What is she?
I stay as motionless as a cloud 💭in a blue sky. 
They observe a grave silence, sharp head waving, closed eyes and a radiant smile on my face for a smidgeon of the moment. Yes, just a smidgeon of the moment, a well-measured smidgeon. Considering that shade of ignorance, the bliss of Shakespeare they pass by.
Today, I draw for you the depiction of my indulgence in that smidgeon.
She is the kiss of an angel.
Her eyes are deeper than the gorges of Gangotri.
Her face reminds me of the imagination I had of Vishkanya(poison-woman) when reading mythology for the very first time to whom I fancied getting bitten even if I die.
Her scattered hairs with a ponytail in the breeze are like mangroves swinging gently on a bright sunny day at the coast of Hoogly. 
When she smiles it feels that the season of springs is about to come in a heatwave.
She doesn't use perfume but I feel perfumed when I am around her, the one which you smell of the sand after mild rain.
Every time she walks she makes a new course. She is a super river indeed.
Her talks are chants of a yogi which bamboozles you if they inspire you more or aspire you more.
She forms an illusion of delta as she walks towards me and makes a short thunderclap in my heart when she hugs me, just like a holy river indulges in a salty sea to turn it somewhat brackish.
Among many, I tell you one intimate moment. Once I saw her naked back, it was reflectively shining like a worn smooth rock by the eternal flow of spring water over it.
Every time I see her I feel like seeing her first time. She ages but she is ageless and edgeless. And eventually, I get shot by life.
She has to be the most beautiful signature of almighty.
This is not a feature film, trailer, promo or anything materialistic. It is the crude depiction of that smidgeon of the moment, yes the well-measured one of my indulgence with a grave silence, sharp head waving, closed eyes and a radiant smile when people hamper me with such questions.
Who is she?
What is she? 

Tuesday, 9 June 2020

' सब अपने घर में हैं '

सब अपने घर में हैं।                 

प्रकृति अपने भंवर में हैं।
नदियाँ घाटियों के उदर में हैं।
पर्वत आसमानों के अधर में हैं।
हवाएँ बादलों के पर में हैं।
अग्नि हर कंकर में है।

सब अपने घर में हैं।

पक्षी अपने सफर में है।
ख़ामोशी हर एक पहर में है।
उदासी हर बसर में है।
मानव अब कहर में है।
काल फिर से सहर में है।

सब अपने घर में है।

सेठ अपने बिस्तर में है।
मजदूर अपने मुक़द्दर में है।
राजनीति अपने चौसर में है।
मानवीयता अपने कनस्तर में है।
समाज अपने डर में है।

सब अपने घर में है।

संक्रमण अत्यंत तीव्र में है।
तीव्र स्वयं शीघ्र में है।
नज़रें हर दम फिक्र में हैं।
खतरा हर एक ज़िक्र में है।
जीवन सिर्फ हिज्र में है।

सब अपने घर में हैं।

Sunday, 16 February 2020

एक दौर

एक दौर की तलाश में एक दौर से गुज़र गया।
एक दौर को उजाड़ कर एक दौर में ठहर गया।

वो आसमान से गहरा और दिशाओं से चौड़ा था।
वो हवाओं से तीव्र और सूरज का सातवाँ घोड़ा था।

वो जीवन से परे समय का एक खेल था।
वो काल की चौखट पर नियति का मेल था।

वो सन्नाटों की आहट में जीवन की बसावट था।
वो विलक्षण ही रातों में उजालों की लिखावट था।

वो आत्मा में जीवन का अदृश्य प्रसार था।
वो ईश्वर के साक्षात्कार का चित्त में प्रचार था।

वो क्षण का क्षण पर समरूप घर्षण था।
वो कण का कण से अद्वितीय आकर्षण था।

वो न जाने क्यों भौतिकता की बेड़ियों में कैद हो गया।
वो लक्ष्य से फिसल कर कपालिका वेद हो गया।

वो हारकर जीता और जीतकर हार गया।
हार को जीतकर तत्काल ही स्वीकार गया।

सँवर कर,संभल कर वो कुछ उस दौर में बिखर गया...

एक दौर की तलाश में एक दौर से गुज़र गया।
एक दौर को उजाड़ कर एक दौर में ठहर गया।

Friday, 11 October 2019

गज़ल :- ' भूल गए '

बारिशें जो घुसी गांव में,
तो पेड़ों पर ही झूल गए।


कुछ कलियाँ क्या खिली बाग में
वो पतझड़ के दिन भूल गए।


हमारी अठखेलियों को खेल समझने वाले,
तेरी जवानी के दिन फ़िज़ूल गए।


वक़्त की तहें मुझे इंसान बनाती रहीं,
हर तरक्की के लम्हे मेरे उसूल गए।


देश में मंदी का हवाला देते देते,
वो उस बूढ़े किसान से सारी खेती वसूल गए।


प्लास्टिक/रबड़ की गेंदों को अपनी रूह से जकड़ने वाले,
मैदान की उस डोली के सारे बबूल गए।


दीवारों को ताउम्र हिफाज़त का हवाला देने वाले
कुछ दरवाज़े बारिशों में फूल गए।


और हमको तुम अपनी वफाओं में सजा के रखना,
फ़िर ना कहना की हम बुलंदियों पर तुम्हे भूल गए।


Sunday, 29 September 2019

'तुम इतनी भी बुरी नही थी'

मेरी सोच एक दम खरी थी।
तुम इतनी भी बुरी नही थी।
आँखें तुम्हारी मदभरी थी।
वो घटाएँ बड़ी गहरी थी।
निगाहें जब तुमने मेरी निगाहों पर धरी थी।
ऋतुएँ बहकते हुए इक क्षण में ठहरी थी।
तुम इतनी भी बुरी नही थी।
मेरी सोच एक दम खरी थी।

उन तमाम चेहरों में से एक चेहरा तुम्हारा।
फूलों ने मुस्कुराते हुए उस वक़्त को गुज़ारा।
दुनियाँ के चेहरों से अनजान,
लोगों की फ़ितरत से नादान
तुम्हारी कल्पनायें मेरा जहान।
वो अल्हड़, मदहोश,आवारा उम्र की मियाद बस पल भर ही थी।
तुम इतनी भी बुरी नही थी।
मेरी सोच 100 फीसद खरी थी।

जिस शाम तुमने मुझे पहली दफा घूरा था।
मेरा निर्माण तब अधूरा था।
मैं मृग की भाँति सहमा,
कस्तूरी के आवेश में झूमा।
हर दिशा भटका,
क़दमों को हर छोर तक पटका।
जीवन से हारकर,खुद को जीता।
ये बात में किसको कहता,
कस्तूरी तो अंततः हिरण की नाभि में भरी थी।
मेरी सोच एक दम खरी थी।
तुम इतनी भी बुरी नही थी।





Saturday, 31 August 2019

भारत की कूटनीतिक विजय

भारत की कूटनीतिक विजय

धारा 370 भारत के संविधान में पांव में लगी उस फांस के सामान थी जो कोशिकाओं में समय की नौक पर रिसते हुए धंसती गयी। सन् 1954 में राष्ट्रिपति के आदेश पर 35 A के सम्मिलन ने इस प्रक्रिया के उत्प्रेरण का कार्य किया। अन्ततः
5 अगस्त 2019 को शल्य क्रिया द्वारा ही इसका उपचार संभव हो सका।
धारा 370 के दो खंडो के संसद द्वारा निरस्त किये जाने से इसकी मारक क्षमता शून्य हो गयी जिसके फलस्वरूप भारत ने एक राष्ट्र के रूप में विश्व में उद्घोषित किया की भारत कभी भी अपनी राज्यक्षेत्रीय संप्रभुता से समझौता नही करेगा।
इसके उपरांत देश विदेश में भौगोलिक राजनीतिक हलचल तीक्ष्ण हो गयी।
संयुक्त राष्ट्र अमेरिका द्वारा कश्मीर कोे द्विपक्षीय मुद्दा बतलाना, यूरोपियन देशों से लेकर खाड़ी देशों का भारत को समर्थन करना, FATF द्वारा पाकिस्तान को blacklist करने की चेतवानी देना या G-7 में कश्मीर का ज़िक्र न होना, प्रत्येक दृष्टान्त में पाकिस्तान कूटनीतिक रूप से पूरी तरह पराजित हो गया है। पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र अमेरिका द्वारा आर्थिक सहायता पर प्रतिबन्ध लगने के उपरांत पाकिस्तान की अर्थवयवस्था अपने सर्वाधिक संवेदनशील दौर से गुज़र रही है। वाकई, अकेला चना भाड़ नही फोड़ सकता।
उस समय जब पाकिस्तानी रुपया डॉलर के मुकाबिल 150 गुना से अधिक गिर चुका है पाकिस्तान का परमाणु युद्ध की धमकी देना और हास्यप्रद नज़र आता है। क्योंकि शेर और मेमने में जंग नही लड़ी जाती शिकार खेला जाता है। जिसका निष्कर्ष पहले से ही स्पष्ट होता है।
पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति को देखते हुए एवं इतिहास को मद्देनज़र रखते हुए यह कहा जाये की पाकिस्तान में सेन्यतख्ता पलट निकट है तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नही होगी।
इस तरह पाकिस्तान को आर्थिक, राजनेतिक, रणनीतिक रूप से ध्वस्त करना भारत की कूटनीतिक विजय ही है।

Wednesday, 7 November 2018

शुभ दीपावली

हवा की हर एक हरकत का प्रतिबिंब है दीप।
जलकर बुझता बुझकर जलता हर एक स्तम्भ है दीप।
प्रतिबिंबों, स्तम्भों पर घटा जो छाए साँवली।
उन तहों को,सतहों को रोशन करता पर्व है दीपावाली।

आपको एवं आपके समस्त परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।

Friday, 19 January 2018

गज़ल : - ' ख्वाब ऊंचे हैं तो ऊंचे ही मंसूब हो '

ख्वाब ऊंचे हैं तो ऊंचे ही मंसूब हो।
खर्चे चाहे काम रहें पर चर्चे खूब हो।

इस छत को और ऊपर उठाया जाए।
घर छोटा रहे पर छत पर पूरी धूप हो।

नीवों को घुमाया जाए।
दिल फ़क़ीर रहे पर हर रंग में भूप हो।

नज़रिया कुछ मोड़ा जाए।
महल रजवाड़ों के रहें अपनी शख्सियत ही बा खूब हो।

मौत को भी चुनौती दी जाए।
ज़मीन थोड़ी कम रहे पर, अपना स्तूप हो।