मैं हर दम अपनी उम्र से बड़ा था।
मेरे हौसलों का मखौल उड़ाने वाले,
मुझे किताबों ने नहीं, अनुभवों ने गढ़ा था।
लाव-लश्कर से जुलूस निकालने वाला,
चुनाव से पहले तक लोगों के पैरों में पड़ा था।
शिविरों में अध्यात्म का पाठ पढ़ाने वाला,
परदेस में देह के बाज़ार में खड़ा था।
रुकने वालों को वक्त निगल गया।
बचा वही जो अंत तक लड़ा था।
एक जंगल को फिर से जन्म दे गया।
जो पेड़ कटते वक़्त अड़ा था।
जिस बुजुर्ग को तुम मंदा कहते हो,
वो अपनी जवानी में हवा से तेज दौड़ा था।
मैं ख्वाबों-ख्यालों में गुम हो गया।
जब उसने अपनी गर्दन को मेरी तरफ मोड़ा था।
वो पूरी दुनियाँ घूमकर वापस आ गया।
मैं अब भी वहीं खड़ा हूँ जहाँ उसने मुझे छोड़ा था।
वो पुराना जर्जर मकान, घर है मेरा,
जिसकी एक-एक ईंट को दादा ने अपने ईमान से जोड़ा था।
उम्र मायने नहीं रखती पुलकित,
तू उतना चमकेगा जितना तूने खुद को तोड़ा था।
✍️ पुलकित उपाध्याय
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