Friday, 1 May 2026

'एक उम्र लगती है'

उसके चर्चे हैं ज़माने में,
मैं, मैं न रहा जिसे पाने में।

इश्क़ करना बहुत आसान है,
किरदार बदल जाता है निभाने में।

वो मुझको रास्ता दिखाता है,
जिसको उम्र गुज़ारी है सिखाने में।

मैं चुपचाप उस गली से गुज़रता हूँ,
मुझे देखकर शोर मच जाता है मयख़ाने में।

कोई उसे बताए, नशे में भी मेरे पैर लड़खड़ाते नहीं,
वो कब से लगा है मुझे बहकाने में।

ज़िंदगी कोई ख़्वाबों का खेल नहीं,
एक उम्र लगती है खुद को तपाने में।

जिन फूलों को किसी सेहरे में बंधना था,
वो फूल पड़े हैं एक मुर्दे को महकाने में।

जो फल तुम तोहफ़े में लुटा रहे हो,
कई पुश्तें लगी हैं उन्हें पकाने में।

वो आग बस्तियाँ जला गई,
जिसे सिर्फ एक चिंगारी लगी थी सुलगाने में।

एक अख़बार ने थोड़ा सच क्या कह दिया,
पूरी सरकार पड़ी है उसे दबाने में।

लोकतंत्र रोकतंत्र हो चुका है,
अब सरकार तय करेगी मुझे क्या खाना है खाने में।

जब भी उनसे बारह सालों का हिसाब पूछो,
वो कहते हैं तुम्हें पचहत्तर साल लगे हैं हमें लाने में।

मैं हर रोज़ घर से पैसे के लिए निकलता हूँ,
खुशियाँ कहाँ बची हैं अब कमाने में।

जिस बात को तुमने सुनने से पहले नकार दिया,
हमें जवानी लगी है उसे बताने में।

चलो एक और बाज़ी हारी जाए,
अब तकलीफ़ कहाँ है कुछ गँवाने में।

✒️ पुलकित उपाध्याय