Friday, 8 May 2026

'हम कितने पुराने हैं'

डिस्को की दुनिया में ग़ज़लों के दीवाने हैं, 
हम वाकई कितने पुराने हैं।

वो मुझको खुदा के दर पर ढूँढता फिरता है, 
हमारे तो मंदिर भी मयखाने हैं।

नज़र भर के देखा था उसे कभी, 
उम्र गुज़र गई, हम अब भी उसी के दीवाने हैं।

वो कहते हैं पाँच सालों में सूरत बदल देंगे, 
ये वादे सत्ता में आने के बहाने हैं।

मेरी हार का जश्न मनाने वाले,
तेरा एक दिन है, हमारे सारे ज़माने हैं।

हो सकता है कल हम न रहें, 
हमारे शब्द सदा फिज़ाओं को महकाने हैं।

तुमको सिर्फ़ छत तक जाना है, 
हमें आसमान तक के रास्ते बनाने हैं।

घर बनाने को ज़मीन नहीं है,
मगर, हमको शहर बसाने हैं।

हसरत कुछ कर गुज़रने की है,
फ़िर क्यों इतने पैसे कमाने हैं।

तुम हमको इस तरह न देखो, 
अब हमें और जज़्बात नहीं गँवाने हैं।

यहाँ रिश्ते क्षणभंगुर हैं, 
पर, हमें एक गुज़रे दोस्त से किए वादे निभाने हैं।

जो लोग दिशा दिखाने से भी गुरेज़ करते थे, 
उन्हें हमारी कामयाबी पर हक जताने हैं।

वो मुझको मौत का डर दिखाता है, 
हम सरफिरों से भी बड़े मनमाने हैं।

रेडियो पर ग़ज़ल सुनते ख्याल आया कि ग़ज़ल कही जाए,
ये ग़ज़ल एकदम नई है, बस ख़्याल पुराने हैं।

उसूलों की गठरी से ज़िंदगी नहीं चलती, 
हमको जीना ही कितना है, हम तो परवाने हैं।

✒️ पुलकित उपाध्याय

Friday, 1 May 2026

'एक उम्र लगती है'

उसके चर्चे हैं ज़माने में,
मैं, मैं न रहा जिसे पाने में।

इश्क़ करना बहुत आसान है,
किरदार बदल जाता है निभाने में।

वो मुझको रास्ता दिखाता है,
जिसको उम्र गुज़ारी है सिखाने में।

मैं चुपचाप उस गली से गुज़रता हूँ,
मुझे देखकर शोर मच जाता है मयख़ाने में।

कोई उसे बताए, नशे में भी मेरे पैर लड़खड़ाते नहीं,
वो कब से लगा है मुझे बहकाने में।

ज़िंदगी कोई ख़्वाबों का खेल नहीं,
एक उम्र लगती है खुद को तपाने में।

जिन फूलों को किसी सेहरे में बंधना था,
वो फूल पड़े हैं एक मुर्दे को महकाने में।

जो फल तुम तोहफ़े में लुटा रहे हो,
कई पुश्तें लगी हैं उन्हें पकाने में।

वो आग बस्तियाँ जला गई,
जिसे सिर्फ एक चिंगारी लगी थी सुलगाने में।

एक अख़बार ने थोड़ा सच क्या कह दिया,
पूरी सरकार पड़ी है उसे दबाने में।

लोकतंत्र रोकतंत्र हो चुका है,
अब सरकार तय करेगी मुझे क्या खाना है खाने में।

जब भी उनसे बारह सालों का हिसाब पूछो,
वो कहते हैं तुम्हें पचहत्तर साल लगे हैं हमें लाने में।

मैं हर रोज़ घर से पैसे के लिए निकलता हूँ,
खुशियाँ कहाँ बची हैं अब कमाने में।

जिस बात को तुमने सुनने से पहले नकार दिया,
हमें जवानी लगी है उसे बताने में।

चलो एक और बाज़ी हारी जाए,
अब तकलीफ़ कहाँ है कुछ गँवाने में।

✒️ पुलकित उपाध्याय