हम वाकई कितने पुराने हैं।
वो मुझको खुदा के दर पर ढूँढता फिरता है,
हमारे तो मंदिर भी मयखाने हैं।
नज़र भर के देखा था उसे कभी,
उम्र गुज़र गई, हम अब भी उसी के दीवाने हैं।
वो कहते हैं पाँच सालों में सूरत बदल देंगे,
ये वादे सत्ता में आने के बहाने हैं।
मेरी हार का जश्न मनाने वाले,
तेरा एक दिन है, हमारे सारे ज़माने हैं।
हो सकता है कल हम न रहें,
हमारे शब्द सदा फिज़ाओं को महकाने हैं।
तुमको सिर्फ़ छत तक जाना है,
हमें आसमान तक के रास्ते बनाने हैं।
घर बनाने को ज़मीन नहीं है,
मगर, हमको शहर बसाने हैं।
हसरत कुछ कर गुज़रने की है,
फ़िर क्यों इतने पैसे कमाने हैं।
तुम हमको इस तरह न देखो,
अब हमें और जज़्बात नहीं गँवाने हैं।
यहाँ रिश्ते क्षणभंगुर हैं,
पर, हमें एक गुज़रे दोस्त से किए वादे निभाने हैं।
जो लोग दिशा दिखाने से भी गुरेज़ करते थे,
उन्हें हमारी कामयाबी पर हक जताने हैं।
वो मुझको मौत का डर दिखाता है,
हम सरफिरों से भी बड़े मनमाने हैं।
रेडियो पर ग़ज़ल सुनते ख्याल आया कि ग़ज़ल कही जाए,
ये ग़ज़ल एकदम नई है, बस ख़्याल पुराने हैं।
उसूलों की गठरी से ज़िंदगी नहीं चलती,
हमको जीना ही कितना है, हम तो परवाने हैं।
✒️ पुलकित उपाध्याय