तू क्यों ख़्वाबों में दिल-ओ-बाज़ार देखता है।
जो रोशनी है वो इस लम्हे में है।
तारीख़ बदलने के बाद कौन अख़बार देखता है।
ये दुनिया ख़ुदगर्ज़ी की हद पर खड़ी है।
तू बेवजह लोगों में हमनशीं देखता है।
मैंने उसको ख़ुदा मानने से इनकार कर दिया।
फिर वो क्यों मुझे अपना भक्त समझता है।
मैं सिर्फ़ एक सरफ़िरा शायर हूँ।
ये निज़ाम मुझे खुलकर बोलने से रोकता है।
बांध टूटने पर बस्तियाँ उजाड़ देते हैं।
तू फ़िज़ूल ही जाते हुए शख़्स को टोकता है।
लोग आएँगे तो आँसुओं का भी सौदा करेंगे।
तू क्यों जज़्बातों को चेहरे पर पटकता है।
मैं उसे एक उम्र से भुलाए बैठा हूँ।
फिर क्यों उसके एक ज़िक्र से मेरा हर मिसरा महकता है।
जवानी बहुत एहतियात से ख़र्च करने की चीज़ है।
फिर क्यों हर आदमी इस मोड़ पर आकर बहकता है।
मैंने कभी उसे कोई इशारा नहीं किया।
फिर वो क्यों मुझे अपना हमसफ़र सोचता है।
'पुलकित', तू सिर्फ़ ख़ुद को मुनासिब कर।
ज़माना तो ख़ुदा को भी ख़ुदा से तौलता है।
✒️पुलकित उपाध्याय