Wednesday, 7 November 2018

शुभ दीपावली

हवा की हर एक हरकत का प्रतिबिंब है दीप।
जलकर बुझता बुझकर जलता हर एक स्तम्भ है दीप।
प्रतिबिंबों, स्तम्भों पर घटा जो छाए साँवली।
उन तहों को,सतहों को रोशन करता पर्व है दीपावाली।

आपको एवं आपके समस्त परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।

Friday, 19 January 2018

गज़ल : - ' ख्वाब ऊंचे हैं तो ऊंचे ही मंसूब हो '

ख्वाब ऊंचे हैं तो ऊंचे ही मंसूब हो।
खर्चे चाहे काम रहें पर चर्चे खूब हो।

इस छत को और ऊपर उठाया जाए।
घर छोटा रहे पर छत पर पूरी धूप हो।

नीवों को घुमाया जाए।
दिल फ़क़ीर रहे पर हर रंग में भूप हो।

नज़रिया कुछ मोड़ा जाए।
महल रजवाड़ों के रहें अपनी शख्सियत ही बा खूब हो।

मौत को भी चुनौती दी जाए।
ज़मीन थोड़ी कम रहे पर, अपना स्तूप हो।




Tuesday, 22 August 2017

"खुद का अक्स मिल जाएगा"

खुद का अक्स मिल जाएगा।
मन का मेल जब धुल जाएगा।
जब चित्त के भीतर से भोग हटेगा।
बुद्धि पटल पर योग जागेगा।
जब रंचमात्र न मोह रहेगा।
लोभ का बाँट ना सतह पर डंटेगा।
जब तपस्वी की भाँति चेष्ठा होगी।
समर्पण की महत्तम पराकाष्ठा होगी।
ऐबों पर जब रौब रहेगा।
वेदों सा सहज शोध रहेगा।
मन के अंधियारे कुंठित होंगे।
विचारों के अंकुर प्रस्फुटित होंगे।
लक्ष्य-प्रदर्शनी ज्योति जलेगी।
कदमताल उस पथ पर बजेगी।
आनंद की नवल भौर उठेगी।
रौशनी काय से हर और बिछेगी।
दिव्यानुभूति हो जाएगी।
प्रकृति जीवंत हो जाएगी।
कतरा-कतरा खिल जाएगा।
खुद का अक्स तब मिल जाएगा।
मन का मेल जब धुल जाएगा।


Sunday, 21 May 2017

सुप्रभात

           
लौटते रात के प्रहरी, निकलते सुबह के सूबेदार,
भौर का समय, पक्षियों की मधुर चहचहाट, उजाले-अंधेरे का आंशिक आलिंगन,
शीतल समीर की अटखेलियां, प्रकृति की स्थाई प्रतीत होती रमणीय व्यवस्था की अवस्था,
दादा साहब के हर एक राही से ओमकारे, राम-राम सुप्रभात का आपसी सत्कार,
शांत टहनियाँ, खुसफुसाती,सरसराती आहिस्ता-आहिस्ता पत्तियाँ,
मंद रोशनी में बादल सा प्रतीत होता नीला आकाश, मौसम की विसंगति के लगाए जाते रचनात्मक कयास
सर्वत्र सुसज्जित, विभूषित, पुरस्कृत, महिमामंडित प्राकृतिक सौंदर्य,
चित्त के आनंदित स्वर से अंगीकृत पंच इंद्रीय, सांसारिकता, भौतिकता, लुप्त होती नैतिकता में मानो सुलह हो गई है,
पुलकित बाबू ! यथार्थता और अयथार्थता में अनुरूपता को ना ढूंढो सुबह हो गई है।

Thursday, 13 April 2017

A Farewell Poem

कल फिर कल में एक नया कल होगा।
पल में तैरता हर एक पल होगा।

सूरज की किरणें, सुबह का इशारा ।
ज़िन्दगी की भाग दौड़, हर शख्स ऊहापोह का मारा।

दौपहर की तपन, सिकता तन और मन।
जीवन की खौज, दिखता सिर्फ और सिर्फ धन।

शाम की उदासी, रात की तन्हाइयां।
जाम के दौर और पन्नो पर शायरियाँ।

पर न होगा कुछ न कुछ तो पूरा।
इस खेल की फितरत ही है रहना अधूरा।

इन लम्हों का यूँ हवा के झौंके सा गुज़र जाना खलेगा।
यह अवसाद अंत तक पलेगा।

यारों की बेमतलब की एक दूसरे से चुगलबाज़ियां।
जैसे एक पुराने छल्ले से गुच्छे में बंधी कुछ चाबियाँ।

उसका सामने से गुज़ारना, वक़्त का मदहोश होना।
मेरा उसको देखना, लिखना और हर दम खामोश रहना।

देखा जाये तो जवानी के सबसे नायाब क्षण अपने पिटारे में रखकर चले जा रहे हैं हम।
ज़िन्दगी से कह दो संक्रमण काल ख़त्म हुआ, अब तुझसे मिलने आ रहें हैं हम।

Saturday, 1 April 2017

#MyDoctrines

The few women are like wine. The older they get the intoxicating they become. Vintage things are always special. 

#MyDoctrines

No one is your friend in market.