वो मेरे किरदार को हर एक पैमाने पर आज़माता बहुत है।
वो किसी संशय में है, किसी उलझन में है या है कोई फ़िक्र उसे,
वो मुझको अपने ख़्वाबों में लाकर सताता बहुत है।
मैं उसकी महक की मृगतृष्णा में एक मृग की भाँति भटकता हूँ,
वो मुझसे इतना दूर होते हुए भी मुझको लुभाता बहुत है।
मैंने एक दिन सोचा कि उससे समझौता किया जाए,
वो सारी यादों को भुलाकर कहता है कि मेरा उससे कोई नाता नहीं है।
मैं चाहूँ तो एक पल में उसकी आँखों से ओझल हो जाऊँ,
कम्बख़्त, ज़माने का ये हुनर मुझको आता नहीं है।
जो प्यादे मेरी चालों को चलकर वज़ीर बन गए,
वो बेगैरत कहते हैं कि मुझको कुछ आता नहीं है।
एक फ़क़ीर सोने का मुकुट चुराते पकड़ा गया,
जो कल मुझसे कह रहा था, साथ कुछ जाता नहीं है।
मैं आँधियों में चरागों को जलाकर बढ़ता चला गया,
मेरा हौसला आँधियों से डगमगाता नहीं है।
उसकी बेदर्दी से आहत होकर भी
मेरा दिल सहमता तो है, पर घबराता नहीं है।
मेरा दिमाग़ चीख-चीख कर कहता है, ख़ुदगर्ज़ बनो,
मेरा दिल मेरी रूह को ये समझाता नहीं है।
मस्जिद की सीढ़ी पर वो मुझे गाता दिखा,
जो रेल में कहकर भीख माँग रहा था कि वो कुछ बोल पाता नहीं है।
चिताओं पर चढ़कर वो कुर्सी पर बैठ गए,
जो कहते थे, मैं सेवक हूँ, राजनेता नहीं हूँ।
मैंने एक अमीर दोस्त से कुछ पैसे उधार माँगे,
वो कहने लगा, मैं खर्च उतना करता हूँ, जितना कमाता नहीं हूँ।
मैं दिन भर शरीर को तोड़ता-फिरता हूँ,
फ़िर भी रात को चैन से सो पाता नहीं हूँ।
लोग मुझसे पूछा करते हैं कि तुम कहाँ तक उड़ान भरोगे,
मैं उनको कैसे कहूँ कि मेरे पंखों के दायरे का आसमान में माप आता नहीं है।
मैंने एक दिन सोचा कि ख़ुदकुशी कर लूँ,
समुंदर मुझे किनारे फेंककर कहने लगा कि तू मुझ में समाता नहीं है।
मैंने कोशिश की कि उसको उसके हाल पर छोड़ दिया जाए,
मेरा मन ख़ुद को उसके पास जाने से रोक पाता नहीं है।
मैंने अगर आँख फेर ली तो वो पछताता फ़िरेगा उम्र भर,
मेरी नज़र वहाँ तक जाती है, जहाँ तक उसका नज़रिया जाता नहीं है।