Monday, 23 February 2026

'मैं मुस्कुराता रहूँगा'

खुद के गुम हो जाने पर,
तुम्हारे न मिल पाने पर,
कल के बाद फिर कल के न आने पर,
हालात और भी बिगड़ जाने पर,
कुछ भी समझ न आने पर भी,
मैं मुस्कुराता रहूँगा।


दिल के टूट जाने पर,
साथ छूट जाने पर,
शीशा फूट जाने पर,
दौलत लुट जाने पर,
किस्मत रूठ जाने पर भी,
मैं मुस्कुराता रहूँगा।


आज फिर से नींद न आने पर,
उम्मीद बिखर जाने पर,
अवसर फिसल जाने पर,
समय निकल जाने पर भी,
फिर से दिल के बहल जाने तक,
मैं मुस्कुराता रहूँगा।


सूरज ढ़लने के बाद,
चाँद के निकलने से पहले,
दिन ढ़लने के बाद,
दिन के निकलने से पहले,
हार जाने के बाद,
हार न मानने से पहले, 
पूरी ताकत से संघर्ष करते हुए,
मैं मुस्कुराता रहूँगा।


फिर एक दिन तारीख बदलेगी,
एक नई सुबह, सुबह-सुबह को निकलेगी।
इंद्रधनुष ध्वजा बनेगा,
पसीना सज्जा बनेगा।
हर दिशा सत्कार में दमकेगी,
ज़िंदगी फिर से चमकेगी।
तब से अब के अब से तब के इस दौर में, 
मैं मुस्कुराता रहूँगा।







Saturday, 21 February 2026

विरोधाभास

वो मुझको चाहता तो है, पर छुपाता बहुत है।
वो मेरे किरदार को हर एक पैमाने पर आज़माता बहुत है।

वो किसी संशय में है, किसी उलझन में है या है कोई फ़िक्र उसे,
वो मुझको अपने ख़्वाबों में लाकर सताता बहुत है।

मैं उसकी महक की मृगतृष्णा में एक मृग की भाँति भटकता हूँ,
वो मुझसे इतना दूर होते हुए भी मुझको लुभाता बहुत है।

मैंने एक दिन सोचा कि उससे समझौता किया जाए,
वो सारी यादों को भुलाकर कहता है कि मेरा उससे कोई नाता नहीं है।

मैं चाहूँ तो एक पल में उसकी आँखों से ओझल हो जाऊँ,
कम्बख़्त, ज़माने का ये हुनर मुझको आता नहीं है।

जो प्यादे मेरी चालों को चलकर वज़ीर बन गए,
वो बेगैरत कहते हैं कि मुझको कुछ आता नहीं है।

एक फ़क़ीर सोने का मुकुट चुराते पकड़ा गया,
जो कल मुझसे कह रहा था, साथ कुछ जाता नहीं है।

मैं आँधियों में चरागों को जलाकर बढ़ता चला गया,
मेरा हौसला आँधियों से डगमगाता नहीं है।

उसकी बेदर्दी से आहत होकर भी
मेरा दिल सहमता तो है, पर घबराता नहीं है।

मेरा दिमाग़ चीख-चीख कर कहता है, ख़ुदगर्ज़ बनो,
मेरा दिल मेरी रूह को ये समझाता नहीं है।

मस्जिद की सीढ़ी पर वो मुझे गाता दिखा,
जो रेल में कहकर भीख माँग रहा था कि वो कुछ बोल पाता नहीं है।

चिताओं पर चढ़कर वो कुर्सी पर बैठ गए,
जो कहते थे, हम सेवक हैं, राजनेता नहीं हैं।

मैंने एक अमीर दोस्त से कुछ पैसे उधार माँगे,
वो कहने लगा, मैं खर्च उतना करता हूँ, जितना कमाता नहीं हूँ।

मैं दिन भर शरीर को तोड़ता-फिरता हूँ,
फ़िर भी रात को चैन से सो पाता नहीं हूँ।

लोग मुझसे पूछा करते हैं कि तुम कहाँ तक उड़ान भरोगे,
मैं उनको कैसे कहूँ कि मेरे पंखों के दायरे का आसमान में माप आता नहीं है।

मैंने एक दिन सोचा कि ख़ुदकुशी कर लूँ,
समुंदर मुझे किनारे फेंककर कहने लगा कि तू मुझ में समाता नहीं है।

मैंने कोशिश की कि उसको उसके हाल पर छोड़ दिया जाए,
मेरा मन ख़ुद को उसके पास जाने से रोक पाता नहीं है।

मैंने अगर आँख फेर ली तो वो पछताता फ़िरेगा उम्र भर,
मेरी नज़र वहाँ तक जाती है, जहाँ तक उसका नज़रिया जाता नहीं है।

Thursday, 15 January 2026

फ़ासले

हम दोनों बिल्कुल एक जैसे हैं, लेकिन कुछ फ़ासले हैं हमारे बीच,
जैसे भौर और सांझ के बीच,
आँख और आँख के बीच,
उम्मीद और आस के बीच,
नदी और नांव के बीच,
बस्ती और गाँव के बीच,
जो बहुत नज़दीक दिखते हुए भी एक दूसरे से बहुत दूर हैं,
अपनी रूहानी यात्रा पर, किन्तु व्याकुल हैं,
सही समय की तलाश में,
सही शब्दों के लिबास में,
सही भाव में,
सही राह पर,
सही मोड़ पर,
जो कहीं खो चुके हैं,
जीवन के संघर्षों में,
स्पर्शहीन निष्कर्षों में
समाज की स्वीकृति में,
नैतिकता की संस्कृति में,
अंतःकरण की अवसादित अग्नि,
सन्नाटों की प्रतिध्वनि में,
मृगतृष्णा के समान क्षणभंगुर लालसा देकर और
पीछे छोड़ गए हैं सिर्फ ये फ़ासले 
और नियति के निष्ठुर काफ़िले।

✒️ पुलकित उपाध्याय