जैसे भौर और सांझ के बीच,
आँख और आँख के बीच,
उम्मीद और आस के बीच,
नदी और नांव के बीच,
बस्ती और गाँव के बीच,
जो बहुत नज़दीक दिखते हुए भी एक दूसरे से बहुत दूर हैं,
अपनी रूहानी यात्रा पर, किन्तु व्याकुल हैं,
सही समय की तलाश में,
सही शब्दों के लिबास में,
सही भाव में,
सही राह पर,
सही मोड़ पर,
जो कहीं खो चुके हैं,
जीवन के संघर्षों में,
स्पर्शहीन निष्कर्षों में
समाज की स्वीकृति में,
नैतिकता की संस्कृति में,
अंतःकरण की अवसादित अग्नि,
सन्नाटों की प्रतिध्वनि में,
मृगतृष्णा के समान क्षणभंगुर लालसा देकर और
पीछे छोड़ गए हैं सिर्फ ये फ़ासले
और नियति के निष्ठुर काफ़िले।
✒️ पुलकित उपाध्याय